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Showing posts from August, 2020

भगवान ऋषभदेव के 10 रहस्य, हर हिन्दू को जानना जरूरी

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भगवान ऋषभदेव के 10 रहस्य, हर हिन्दू को जानना जरूरी > Share"> अनिरुद्ध जोशी 🔴जैन और हिन्दू दो अलग-अलग धर्म हैं, लेकिन दोनों ही एक ही कुल और खानदान से जन्मे धर्म हैं।  भगवान ऋषभदेव स्वायंभुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए-  👉स्वायंभुव मनु,  👉प्रियव्रत,  👉अग्नीन्ध्र,  👉नाभि और फिर  👉ऋषभ।  ♨️जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं।  24 तीर्थंकरों में से पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे।  ऋषभदेव को हिन्दू शास्त्रों में वृषभदेव कहा गया है। जानिए उनके बारे में ऐसे 10 रहस्य जिसे हर हिन्दू को भी जानना जरूरी है।   🔴1. भगवान विष्णु के 24 अवतारों का उल्लेख पुराणों में मिलता है।  ♨️ भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में 8वां अवतार लिया था।   ♨️ ऋषभदेव महाराज नाभि और मेरुदेवी के पुत्र थे ।  ♨️ दोनों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।  ♨️यज्ञ में परम ऋषियों द्वारा प्रसन्न किए जाने पर , हे  ♨️ विष्णुदत्त , प...

श्रमण परंपरा की प्राचीनता

श्रमण परंपरा की प्राचीनता» History Guruji भारतीय प्रायद्वीप प्रागैतिहासिक काल से ही विभिन्न धर्मों के उद्भव, विकास और स्थायित्व का आश्रयदाता रहा है और उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों, जीवन-विधाओं के संघर्ष और समन्वय के द्वारा भारतीय इतिहास की प्रगति एवं संस्कृति का विकास हुआ है। हड़प्पा संस्कृति के विविध पक्षों के उद्घाटन के बाद लगता है कि भारत में आर्यों का आक्रमण एक सभ्य प्रदेश में बर्बर जाति का प्रवेश था। ♨️यद्यपि आर्यों ने अपनी पूर्ववर्ती आर्येत्तर सभ्यता को ध्वस्त कर अपनी विशिष्ट भाषा, धर्म और समाज को भारत में प्रतिष्ठित किया, किंतु यह सांस्कृतिक विध्वंस निरवय विनाश नहीं था और हड़प्पा संस्कृति के अनेक तत्त्व परवर्ती आर्य-सभ्यता में अंगीकृत हुए। ♨️आर्य तथा श्रमण परंपरा का यह समन्वय भारतीय सभ्यता के निर्माण की आधार-शिला सिद्ध हुई है। ♨️वस्तुतः भारतीय संस्कृति में नवीनता और प्राचीनता में बराबर संघर्ष होता रहा है । इस संघर्ष में नवीनता पनपती रही, किंतु प्राचीनता का भी सर्वथा विनाश नहीं हुआ । भारतीय संस्कृति में प्राचीनता और नवीनता दोनों को ही समय-समय पर यथोचित सम्मान मिलता रहा है। यद...

सोनागिरि नाम प्राचीन नहीं, सिद्ध क्षेत्र अति प्राचीन

सोनागिरि नाम प्राचीन नहीं, सिद्ध क्षेत्र अति प्राचीन अर्हत् वचन वर्ष—७, अंक—२, अप्रैल ९५ में डा. एच. बी. माहेश्वरी, ग्वालियर का आलेख ‘ सोनागिरि तीर्थ स्थल की प्राचीनता ’ प्रकाशित हुआ था। इस लेख में माननीय लेखक ने सचित्र प्रमाणों के आधार पर इस क्षेत्र को ईसा पूर्व की तीसरी शताब्दी का सिद्ध किया था। इस लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डॉ. कस्तूर चन्द्र ‘सुमन’, महावीरजी ने हमें अपनी टिप्पणी ‘सोनागिरि तीर्थ स्थल की प्राचीनता’ प्रेषित की थी जिसे हमनें वर्ष–७, अंक—४ अक्टूबर ९५ में प्रकाशित किया था। हमें यह देखकर प्रसन्नता है कि सोनागिरि की प्राचीनता पर अनेक विद्वानों ने यथेष्ट मंथन किया है एवं इसी का प्रतिफल है कि हमें श्री रामजीत जैन, एडवोकेट, ग्वालियर ने इस सन्दर्भ में तत्काल एक लेख प्रेषित किया है जो हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं। सुधी पाठकों की सप्रमाण प्रतिक्रियायें सादर आमंत्रित हैं। ♨️भारतवर्ष के बुन्देलखण्ड क्षेत्र तथा वर्तमान मध्य प्रदेश के दतिया जिले में अवस्थित सोनागिरि सिद्धक्षेत्र बड़ा महत्त्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र है।  ♨️जैन संस्कृति का प्रतीक यह क्षेत्र वास्तव में विन्ध्य ...

तीन मूर्ति मंदिर

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तीन मूर्ति मंदिर भगवान आदिनाथ,भरत एवं बाहुबली की खड्गासन प्रतिमाओं से इस मंदिर का नाम सार्थक है | कमल पर विराजमान भगवान नेमिनाथ एवं पार्श्वनाथ से इस मंदिर की शोभा द्विगुणित हो गयी है | देश विदेश से लोग यहाँ दर्शन करने आते है |जब भक्त लोग ये तीन मूर्तियों पर पंचामृत अभिषेक करते है तो भक्त जन अपने पुण्य की सरहना भी करते है और भगवान नेमिनाथ की पद्मासन प्रतिमा जो की हरे पाषाण की है वह बहुत आकर्षण और मनोहारी भी लगती है जब इस पे भक्त जन दूध का अभिषेक करते है तो यह दृश्य मन को लुभाता है और इन प्रतिमा में इनके चिन्ह अलग से भी नीचे दर्शाये गए है |और श्वेत कमल व श्वेत हंस भी इन प्रतिमा के साथ भी बने हुए है| ये दृश्य तीन मूर्ति मंदिर के बाहर के दरवाजे का है यात्री जब भी इस दर्शन हेतु आते है तो बाहर से ही पता चल जाता है की ये तीन मूर्ति मंदिर है और यह मंदिर नं०-2 है |

ऋषभदेव मंदिर

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ऋषभदेव मंदिर यह प्रतिमा तीन मूर्ति के ऊपर वाले मंदिर में विराजमान है | यह ऋषभ देव की प्रतिमा खड्गासन में बड़ी मनोहारी लगती है और यात्री बंधु दर्शन करके अपने पुण्य की सराहना भी करते है जैसे मांगीतुंगी में माता जी की प्रेरणा से भगवान ऋषभ देव की प्रतिमा विराजमान हुई है वैसे ही माता जी ने तीन मूर्ति मंदिर में आदिनाथ भगवान ,भरत,बाहुबलि भगवान की प्रतिमा विराजमान की है | ऐसे ही माता जी की प्रेरणा से तीन मूर्ति मंदिर के ऊपर भगवान ऋषभ देव की प्रतिमा भी खड्गासन में विराजमान कराई गई है |

कमल मंदिर

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कमल मंदिर कमल मंदिर में कल्पवृक्ष भगवान महावीर की अतिशयकारी, मनोहारी एवं अवगाहना प्रमाण सवा दस फुट ऊँची खड्गासन प्रतिमा विराजमान हैं , इस मंदिर में भगवान महावीर की अवगाहनाप्रमाण ७ हाथ ऊँची प्रतिमा विराजमान हैं| * सर्वप्रथम फरवरी सन् 1975 में इस प्रतिमा की प्रतिष्ठा बाद ही क्षेत्र का विकास प्रगति को प्राप्त हुआ और आज भी जम्बूद्वीप ही नहीं अपितु पुरे हस्तिनापुर में तीर्थ विकास विकास के प्रशंसनीय कार्य तीव्रगति के साथ सम्पन्न हो रहे हैं | यहाँ भक्तगण छत्र चढ़ाकर अथवा दीपक जलाकर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं |और यहाँ पर रोते हुए भक्त-जन दर्शन करके हँसते हुए जाते है | भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा जो कोई भी एक बार देख लेता है वह भूले नहीं भूलता है इस प्रतिमा में इस तेज है जो भी सच्चे मन से कुछ भी मांगता है उसका मांगा कभी खाली नहीं जाता है | इसलिए इनको कल्पवृक्ष महावीर भगवान कहते है | यह रोशनी देखने के लिए भक्त जन दिन में ही आ जाते है जब हल्की रात होते ही यह रोशनी जलती है तो भक्त -जन यह दृश्य देख खूब प्रसन्न होते है | और फिर यात्री-गण आरती का अवसर भी प्राप्त कर लेते है |

अद्वितीय रचना: तेरहद्वीप जिनालय

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अद्वितीय रचना: तेरहद्वीप जिनालय ये मंदिर के बाहर का फोटो है इस मंदिर में जब सुबह अभिषेक होता है तो जो भी अभिषेक भक्त -जन के परिवार वाले करते है सबसे पहले ही उनको अंदर परिक्रमा लगाने का अवसर मिलता है |और यहाँ भी सुबह पंचामृत अभिषेक होता है जो की माता जी की प्रेरणा से रोज 24 भगवान की प्रतिमा का अभिषेक होता है |जब पंचकल्याणक समाप्त हुआ था तो इन्द्रो दवारा एक चमत्कार भी हुआ था | इस मंदिर में देवता ने खुश होकर सोने की गिनी भी सबको बाटी थी | यह एक चमत्कार से कम नहीं था | जम्बूद्वीप तीर्थ पर अनूठी कृतियों का संगम अद्भुत प्रस्तुति के साथ अति विशिष्ट जिनमंदिरों के रूप में देखा जा सकता है। इन्हीं में एक है-तेरहद्वीप जिनालय। जैन भूगोल के लगभग समग्र स्वरूप को प्रदर्शित करने वाली इस रचना का निर्माण होना पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का एक दिव्य स्वप्न था, जो 27 अप्रैल से 2 मई 2007 के मध्य 5 दिनों तक आस्था चैनल पर सीधे प्रसारण के साथ सम्पन्न हुए भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवपूर्वक साकार हुआ। इस रचना में भक्तों को मध्यलोक में स्थित 13 द्वीप के 458 अकृत्रिम जिनमंदिर, पंचमेरु पर्वत, 170 समवसरण, ...

ओम मंदिर

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ओम मंदिर अरिहंत ,सिद्ध,आचार्य उपाध्याय और साधु परमेष्ठियों की प्रतिमाओं सहित ॐ (ओम) रचना इस मंदिर में विराजमान है | ॐ मंदिर में विराजमान पंचपरमेष्ठी भगवन्तों की प्रतिमाओं से संयुक्त ग्रेनाइट का विशाल ॐ पूज्य माता जी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप स्थल पर प्रथम बार इस ओम मंदिर का निर्माण किया गया है | जिसमे ॐ की रचना में पंच परमेष्ठी भगवान विराजमान किये गये है | ओम का अर्थ - अरिहंता असरीरा,आइरिया तह उवज्झाया मुणिणो | पढ़मक्खरणिप्पण्णो, ओंकारो पंच परमेट्ठी | अर्थ-   अरिहंत का प्रथम अक्षर 'अ,अशरीर (सिद्ध) का 'अ' आचार्य का 'आ',उपाध्याय का 'उ', और मुनि (साधु) का 'म्' इस प्रकार पंचपरमेष्ठियों के प्रथम अक्षर (अ + अ + आ + उ + म्) को लेकर 'स्वेऽको दी' और 'आदूगुण:' सूत्र से संधि करने पर 'ओम' मन्त्र सिद्ध होता है | इससे यह पंचपरमेष्ठी का वाचक है | इस मंदिर में ॐ में अरिहंत,सिद्ध ,आचार्य,उपाध्याय और साधु इन पंचपरमेष्ठियों की प्रतिमाएँ वीर नि.सं.२५२४ माघ शु.१५ दिनाँक ११-०२-१९९८ को विराजमान की गई है 

वासुपूज्य मंदिर

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वासुपूज्य मंदिर इस मंदिर में श्री वासुपूज्य भगवान की प्रतिमा वीर नि.सं. २५२१ आश्विन शु.१३ दिनाँक ०६-१०-१९९५ को विराजमान की गई है गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के ससंघ सानिध्य में आर्यिका श्री अभयमती माता जी की प्रेरणा से ये भगवान विराजमान हुए है | चम्पापुरी में जिनके पांच कल्याणक हुए है ऐसे ये तीर्थंकर भगवान यहाँ विराजमान है |

शांतिनाथ मंदिर

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शांतिनाथ मंदिर इस मंदिर में शान्ति, कुन्थु,अरहनाथ भगवान की प्रतिमा अगल -बगल खड्गासन में और उनके आगे काळे पाषाण की सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है और यहाँ पे हंसो से सुशोभित सरस्वती माता भी विराजमान है | इस मंदिर में भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ भगवान अरहनाथ तीर्थंकर भगवान की प्रतिमाएँ वीर नि. सं.२५२१ आश्विन शु.१३ दि. ६-१०-१९९५ को विराजमान की गई | अनन्तर वीर.नि.सं. २५२२ में भगवान सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ की प्रतिमाएँ विराजमान हुई | बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शान्तिसागर जी महाराज के प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागर महाराज की शिष्या गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ -आर्यिका श्री चंदनामती माताजी,पीठाधीश क्षु.श्री मोती सागर जी महाराज , क्षु.श्री श्रद्धामती माता जी के सानिध्य में यह पुनीत कार्यक्रम सम्पन्न हुआ हैं |

बीस तीर्थंकर मंदिर

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बीस तीर्थंकर मंदिर श्रेणी :  जम्बूद्वीप परिसर के मंदिर

सहस्त्रकूट मंदिर

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सहस्त्रकूट मंदिर 1008 जिनप्रतिमाओं से संयुक्त सहस्रकूट मंदिर |

आदिनाथ मंदिर

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आदिनाथ मंदिर

नवदेवता मंदिर

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नवदेवता मंदिर अरिहंत,सिद्ध,आचार्य,उपाध्याय,साधु,जिनधर्म,जिनागम,जिनचैत्य और चैत्यालय इन्हें नवदेवता कहते हैं | अरिहंत भगवान के द्वारा कहे गये धर्म को जिनधर्म कहते है| जिनेन्द्र देव द्वारा कहे गये एवं गणधर देव आदि ऋषियों के द्वारा रचे गये शास्त्र को जिनागम कहते है | अरिहंत देव की प्रतिमा को जिनचैत्य कहते है | और जिनमंदिर को चैत्यालय कहते हैं |

सप्त परमस्थान मंदिर

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सप्त परमस्थान मंदिर जैनशासन में सप्तपरमस्थान नामक व्रत होता है , जो कि श्रावण शुक्ला एकम से श्रावण शुक्ला सप्तमी तक किया जाता है ।इसकी पूरी विधि व्रतविधि से देखकर जानें ।

नवग्रह शान्ति मंदिर

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नवग्रह शान्ति मंदिर उत्तर भारत में प्रथम बार निर्मित नवगहशांति जिनमंदिर, जहाँ 9 कमलासनों पर विराजमान है नवग्रहों के अरिष्ट को दूर करने वाले नव तीर्थंकरों की अष्टधातु से बनी प्रतिमाएँ 

अष्टापद मंदिर

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अष्टापद मंदिर   त्रिकाल चौबीसी तीर्थंकर प्रतिमाओं से संयुक्त अष्टापद जिनमंदिर | इस मंदिर के अंदर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की निर्वाणभूमि अष्टापद -कैलाशपर्वत की आकर्षक प्रतिकृति विराजमान है | कैलाशपर्वत का ही दूसरा नाम अष्टापद है 4 फरवरी 2000 को लाल किला मैदान,दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा इस प्रतिकृति के समक्ष निर्वाणलाडू चढ़ाकर इसका उद्घाटन किया गया |   अष्टापद जिनमंदिर में 72 जिनालयों से युक्त पर्वत का दृश्य |

ध्यान मंदिर

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ध्यान मंदिर यह ध्यान मंदिर के बाहर का दृश्य है | यह दृश्य देखते ही मन को आकर्षित करती है कि इस मंदिर में मंदिर के बाहर ऊपर की ओर हरी घास क्यों लगी है ? मंदिर की सुंदरता के लिए यहाँ पर घास लगाई गयी है जो की एक अनोखी कला दिखाई गयी है । हरियाली का प्रतीक भी है कि जो मंदिर बाहर से ही लोगों को इतना आकर्षित कर रहा है तो अंदर में कितना सुंदर वातावरण होगा , जिससे ध्यान में मन लगेगा । अत: एक बार इसका दर्शन करके मन को पावन करें| ध्यान मंदिर में विराजमान 24 तीर्थंकरों से संयुक्त यह'ह्रीँ' बीजाक्षर की प्रतिमा है| यह मंदिर ध्यान के लिए अलग से इसलिए बनाया है , क्योंकि कहा जाता है कि ध्यान एकांत में ही हो सकता है । और कहा भी गया है कि कम से कम आप लोग 10 मिनट अपनी आत्मा को दो ,क्योंकि जब तक आप अपने को नहीं जानोगे तब तक आप परमात्मा से कैसे मिल पाओगे ? इसलिए आप 10 मिनट ही सही , लेकिन प्रभु का ध्यान जरूरी है यही ध्यान से आप स्वस्थ भी रहेंगे और 10 मिनट ही सही आप संसार से हटकर अपनी आत्मा को जानेगे और समझेंगे | ध्यान से ही आप अपने मन को भी स्थिर कर पाएगे और एक दिन नहीं दो दिन नहीं जब बार-बार यह प्र...

जम्बूद्वीप रचना

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जम्बूद्वीप रचना सन् 1965 में श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चातुर्मास के मध्य जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी परमपूज्य 105 गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी को विंध्यगिरि पर्वत पर भगवान बाहुबली के चरण सानिध्य में पिण्डस्थ ध्यान करते-करते मध्यलोक की सम्पूर्ण रचना, तेरहद्वीप का अनोखा दृश्य ध्यान की तरंगों में दिखाई दिया। पुनः दो हजार वर्ष पूर्व के लिखित तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों में उसका ज्यों का त्यों स्वरूप देखकर वह रचना कहीं धरती पर साकार करने की तीव्र भावना पूज्य माताजी के हृदय में आई और उसका संयोग बना हस्तिनापुर में। कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, बंगाल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि प्रांतों में विहार करने के बाद सन् 1974 में पूज्य आर्यिका श्री का ससंघ पदार्पण हस्तिनापुर तीर्थ पर हुआ। बस तभी से हस्तिनापुर ने नये इतिहास की रचना प्रारंभ कर दी। यह एक अनहोना संयोग ही है कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व तृतीय काल के अंत में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के प्रथम आहार दाता-हस्तिनापुर के युवराज श्रेयांस ने स्वप्न में सुमेरु पर्वत देखा था और आज पंचमकाल में उसी हस्तिनापुर की ...

चौबीस तीर्थंकर जिनालय

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चौबीस तीर्थंकर जिनालय

तीन लोक रचना

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तीन लोक रचना जम्बूद्वीप तीर्थ पर निर्मित तीनलोक रचना जम्बूद्वीप तीर्थ पर विश्व में प्रथम बार निर्मित एक और रचना है,जिसे 'तीनलोक' कहा जाता है | इस रचना में जैन धर्म के अनुसार अधोलोक, मध्यलोक एवं ऊर्ध्वलोक की अवस्थिति प्रदर्शित की गई है, जिसमें अधोलोक में भवनवासी, व्यंतर आदि देवों के भवन, जिनमंदिर तथा 7 नरक व वहाँ उपस्थित नारकियों की दशा, मध्यलोक में पंचमेरू पर्वत आदि तथा ऊर्ध्वलोक में 16 स्वर्ग में रहने वाले देवों का ऐश्वर्य, भव्य जिनमंदिर, नवग्रैवेयक,नवअनुदिश,पंच अनुत्तर व सबसे ऊपर सिद्धशिला आदि प्रदर्शित किये गये हैं | इस रचना में विराजमान की गई समस्त प्रतिमाएं पंचकल्याणक पूर्वक प्रतिष्ठित हैं |"अच्छे कार्यों से शुभ फलस्वरूप स्वर्ग व मोक्ष का वैभव एवं बुरे कार्यों के अशुभ फलस्वरूप नरक की वेदना",इस रचना के दर्शन से प्रत्येक जनमानस को यही सन्देश प्राप्त होता है | विशेषता- इस रचना में लिफ्ट के द्वारा सेकेण्डों में सिद्धशिला तक पहुँचा जा सकता है | यहाँ लिफ्ट की भी सुन्दर ब्यवस्था है , जिससे अशक्त यात्री भी ऊपर तक जाकर वन्दना का लाभ लेते हैं । तथा सीढ़ियों से भी ऊपर सिद्ध...

गणिनी ज्ञानमती हीरक जयंती एक्सप्रेस‘तीर्थंकर जन्मभूमि यात्रा’

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गणिनी ज्ञानमती हीरक जयंती एक्सप्रेस‘तीर्थंकर जन्मभूमि यात्रा’ 24 तीर्थंकरों भगवन्तों की जन्मभूमियों के संदर्भ में जानकारी प्रस्तुत करने हेतु जम्बूद्वीप-हस्तिनापुुर में गणिनी ज्ञानमती हीरक जयंती एक्सप्रेस ‘तीर्थंकर जन्मभूमि यात्रा’ नामक रेल का निर्माण किया गया है। पूज्य माताजी की 75वीं जन्मजयंती-14 अक्टूबर 2008 के अवसर पर आयोजित हीरक जयंती महोत्सव में उद्घाटित इस रेल की एक बोगी में आकर्षक पेेटिंग्स द्वारा तीर्थंकर जन्मभूमियों के तत्कालीन वास्तविक स्वरूप तथा वर्तमान अवस्थिति को प्रकाशित किया गया है। इसके अवलोकन से भक्तों में तीर्थंकर जन्मभूमियों की यात्रा एवं उनके विकास के प्रति जागृति आ रही है। ज्ञातव्य है कि गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से अभी तक 12 तीर्थंकर जन्मभूमियों का विकास हो चुका है, जिनमें हस्तिनापुर, अयोध्या, कुण्डलपुर (नालंदा), काकंदी- गोरखपुर (उ.प्र.), राजगृही (नालंदा) तथा सारनाथ (वाराणसी) शामिल हैं। आगे भी तीर्थंकर जन्मभूमियों के विकासकार्य हेतु समिति प्रयासरत है। इस एक्सप्रेस रेल की दूसरी बोगी में जम्बूद्वीप थिऐटर का निर्माण किया गया है, जिसमें यात्रियों के लिए वि...

बड़ी मूर्ति मंदिर

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बड़ी मूर्ति मंदिर जम्बूद्वीप तीर्थ पर विराजमान 31-31 फुट उत्तुंग भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ की विशाल खड्गासन प्रतिमाएँ तीन विशाल प्रतिमाओं की स्थापना जम्बूद्वीप तीर्थ के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ तीर्थंकर जन्मभूमियों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था, जब भगवान शान्तिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ जैसे तीन-तीन पद के धारी महान तीर्थंकरों की साक्षात् जन्मभूमि हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पाषाण की 31-31 फुट उत्तुंग तीन विशाल प्रतिमाएं अत्यन्त मनोरम मुद्राकृति में निर्मित करके राष्ट्रीय स्तर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ विराजमान की गईं। 11 फरवरी से 21 फरवरी 2010 तक यह आयोजन भव्यतापूर्वक सम्पन्न हुआ, जिसमें देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। समापन के तीन दिवसों में तीनों भगवन्तों का ऐतिहासिक महामस्तकाभिषेक महोत्सव भी सम्पन्न हुआ। हस्तिनापुर की प्राचीनता भारत एक अद्भुत धनाढ्य देश है क्योंकि यहाँ सदैव आध्यात्मिक महापुरुषों ने जन्म लेकर अपनी त्याग, तपस्या एवं साहित्य लेखन आदि के द्वारा अमूल्य निधियाँ विश्व को प्रदान की है। इसे हम दूसरे शब्दों म...

भगवन चंद्रप्रभु मंदिर

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भगवन चंद्रप्रभु मंदिर

jain

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