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Shri Nagphani Parshwanatha Temple

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Sumit Ravi Sarwade Articles Shri Nagphani Parshwanatha Temple Shri Nagphani Parshwanatha Temple, Rajasthan Shri Nagphani Parshvanatha Temple located in Rajasthan is dedicated to Lord Parshvanatha. The temple also houses many other idols of Jain Tirthankaras. Shri Nagphani Parshvanatha Temple located in Moder in  Rajasthan  is a Jain pilgrimage centre. It is an Atishaya Kshetra i.e. Place of Miracles. Moder is a village in the mandal of Bichiwara, Dungarpur. The presiding deity of the temple is  Lord Parshvanatha . The temple is located at a distance of 12 km from Bichiwada.  History of Nagphani Parshvanatha Temple   According to history, Nagphani Parshvanatha Temple dates back to the ancient times. It is associated with many legends and miracles.  As per one legend the idol of Nagphani Parshvanatha was found in a dense forest lying on the top of hill. One day an old woman had come there. When she saw the idol lying there she became devotional and thus began...

२४ तीर्थंकर नाम और चिन्ह लांछन /निशान :

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२४ तीर्थंकर नाम और चिन्ह लांछन /निशान :૨૪ તીર્થંકર ||   24 TIRTHANKARS WITH LANCHANS IN ENGLISH HINDI AND GUJRATI : २४ तीर्थंकर नाम और लांछन /निशान / चिन्ह  || To download AAO JINJI 24 TIRTHANKAR VONDSU SONG click  HERE || JAIN 24 TIRTHANKAR WITH LACHAN FREE MP3   || 24 TIRTHANKARA/२४ तीर्थंकर नाम और  चिन्ह/ लांछन /निशान  24 TIRTHANKARAS WITH LANCHANS 24 TIRTHANKARAS WITH LANCHANS Below para is taken from : http://jainworld.com/jainbooks/tirthankar/apendix-5.htm The Symbol of Tirthankar: A Study There are twenty four Tirthankars. Every Tirthankar has a specific representative symbol that is known as Lanchan". Generally all the idols of Tirthankars are similar except for Parshvanath which has a serpent hood over the head. Some idols of Rishabhdev show locks or a bun of hair on the head. Suparshvanath idols too have a serpent hood sometimes but there is a marked difference from that over Parshvanath. The hood over Suparshvanath has five serpent heads whe...

ऋजुवालुकेच्या तीरावरचा सूर्योदय

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ऋजुवालुकेच्या तीरावरचा सूर्योदय -  August 31, 2020   इसवी सन सहाशे वर्षांपूर्वीची मगध देशातील मध्यमपावा नगरी एक धार्मिक केंद्र म्हणून प्रख्यात होती. संस्कृती व वैदिक पंडित यांचे तर ते एक तीर्थस्थळच झाले होते. अशा मध्यमपावा नगरात सोमिल नामक एक धनाढय ब्राहमण राहत होता. त्याने एका विशाल महायज्ञाचे आयोजन केले. हा महायज्ञ केवळ मगध देशातच नव्हे ,  तर संपूर्ण उत्तर भारतात चर्चेचा व आकर्षणाचा विषय ठरला  होता . उत्तर भारतातील सर्व वैदिकांना अशा महायज्ञात सहभागी होण्याचा मोह अनावर झाला होता. मोठ-मोठया नगरांपासून छोटया-छोटया खेडयांपर्यंत महायज्ञ ज्ञाची  वार्ता पोहचली. हजारोंच्या संख्येने स्त्रीपु रु ष या महायज्ञाच्या पवित्र यज्ञज्वालेचे दर्शन घेण्यासाठी मध्यमपावेच्या दिशेन निघाले. पूर्व भारतातील अकारा दिग्गज विद्वान आपल्या ४४०० शिष्यांसह या महायज्ञात सहभागी  झाले  होते. याव रू न सामान्यजन किती प्रमाणात तेथे उपस्थित असतील , याची कल्पना  आपण येवू शकते.  महायज्ञाच्या अनुभूतीत बुडालेल्या  श्रद्धाळूं चे भाग्य जोरावर होते. पवित्र यज्ञज्वालेसह त्यांना ऋ ज...

भगवान ऋषभदेव के 10 रहस्य, हर हिन्दू को जानना जरूरी

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भगवान ऋषभदेव के 10 रहस्य, हर हिन्दू को जानना जरूरी > Share"> अनिरुद्ध जोशी 🔴जैन और हिन्दू दो अलग-अलग धर्म हैं, लेकिन दोनों ही एक ही कुल और खानदान से जन्मे धर्म हैं।  भगवान ऋषभदेव स्वायंभुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए-  👉स्वायंभुव मनु,  👉प्रियव्रत,  👉अग्नीन्ध्र,  👉नाभि और फिर  👉ऋषभ।  ♨️जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं।  24 तीर्थंकरों में से पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे।  ऋषभदेव को हिन्दू शास्त्रों में वृषभदेव कहा गया है। जानिए उनके बारे में ऐसे 10 रहस्य जिसे हर हिन्दू को भी जानना जरूरी है।   🔴1. भगवान विष्णु के 24 अवतारों का उल्लेख पुराणों में मिलता है।  ♨️ भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में 8वां अवतार लिया था।   ♨️ ऋषभदेव महाराज नाभि और मेरुदेवी के पुत्र थे ।  ♨️ दोनों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।  ♨️यज्ञ में परम ऋषियों द्वारा प्रसन्न किए जाने पर , हे  ♨️ विष्णुदत्त , प...

श्रमण परंपरा की प्राचीनता

श्रमण परंपरा की प्राचीनता» History Guruji भारतीय प्रायद्वीप प्रागैतिहासिक काल से ही विभिन्न धर्मों के उद्भव, विकास और स्थायित्व का आश्रयदाता रहा है और उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों, जीवन-विधाओं के संघर्ष और समन्वय के द्वारा भारतीय इतिहास की प्रगति एवं संस्कृति का विकास हुआ है। हड़प्पा संस्कृति के विविध पक्षों के उद्घाटन के बाद लगता है कि भारत में आर्यों का आक्रमण एक सभ्य प्रदेश में बर्बर जाति का प्रवेश था। ♨️यद्यपि आर्यों ने अपनी पूर्ववर्ती आर्येत्तर सभ्यता को ध्वस्त कर अपनी विशिष्ट भाषा, धर्म और समाज को भारत में प्रतिष्ठित किया, किंतु यह सांस्कृतिक विध्वंस निरवय विनाश नहीं था और हड़प्पा संस्कृति के अनेक तत्त्व परवर्ती आर्य-सभ्यता में अंगीकृत हुए। ♨️आर्य तथा श्रमण परंपरा का यह समन्वय भारतीय सभ्यता के निर्माण की आधार-शिला सिद्ध हुई है। ♨️वस्तुतः भारतीय संस्कृति में नवीनता और प्राचीनता में बराबर संघर्ष होता रहा है । इस संघर्ष में नवीनता पनपती रही, किंतु प्राचीनता का भी सर्वथा विनाश नहीं हुआ । भारतीय संस्कृति में प्राचीनता और नवीनता दोनों को ही समय-समय पर यथोचित सम्मान मिलता रहा है। यद...